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73 साल बाद शेष भारत से जुड़ा पंजाब का कसोवाल

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गुरदासपुर के डेरा बाबा नानक में रावी के उस पार शेष भारत से अलग इलाके का नाम है कसोवाल एनक्लेव। 35 वर्ग किमी क्षेत्र में फैला कसोवाल पाकिस्तान के साथ अपनी सीमा साझा करता है। करतारपुर कॉरीडोर से 5 किमी दूर स्थित यह इलाका आजादी के बाद से मानसून के समय सड़क मार्ग से शेष भारत से अलग हो जाता था। हालांकि बीएसएफ की पोस्ट वहां हैं और वह हर मौसम इस एनक्लेव की रक्षा करती है। अब सेना की सड़क बनाने वाली संस्था बॉर्डर रोड ऑर्गेनाइजेशन (बीआरओ) ने 484 मीटर लंबा पुल बनाकर इस इलाके को हमेशा के लिए शेष भारत से जोड़ दिया है। पहले सेना के पैंटून पुल से ही उस पार जाया जाता था। यहां हजारों एकड़ उपजाऊ भूमि है। किसानों को मानसून में अपने घर और खेत छोड़कर रावी के दूसरी तरफ पलायन भी करना पड़ता था। सभी को दो दो मकानों की मैनटेनेंस करनी पड़ती थी। इस पलायन से भी किसानों को मुक्ति मिल गई है। मानसून में रावी उफान पर होती है। ऐसे में पैंटून पुल उठा लिया जाता था। अब पक्के पुल के बनने से किसानों और सुरक्षा बलों ने राहत की सांस ली है। 

49 बॉर्डर रोड टास्क फोर्स की 141वीं ड्रेन मैनटेनेंस कंपनी ने इस पुल को बनाया है। पुल की कुल लागत 17.89 करोड़ रुपए है। 30.25 मीटर लंबे कुल 16 सैल से इसका निर्माण किया है। कसोवाल एनक्लेव का कुल क्षेत्रफल 35 वर्ग किमी है। सेना ने इसे बैसाखी तक बनाने का वादा किया था। 15 मार्च को आखिरी सैल रखते हुए पुल तैयार कर दिया गया था। डायरेक्टर जनरल बॉर्डर रोड लेफ्टिनेंट जनरल हरपाल सिंह ने बताया कि पुल के निर्माण के वक्त कोरोना (SARS-CoV-2) से बचाव के लिए जरुरी उपाय किए गए थे। 23 मार्च को कर्फ्यू के चलते काम रुक गया था। अब गेहूं की कटाई का सीजन आया तो हमने किसानों की परेशानी देखते हुए इसके निर्माण को पूरा करने का निर्णय लिया। सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करते हुए पुल की सुरक्षा के लिए जरूरी कार्य पूरे किए गए और अब इस पुल का निर्माण पूरा हुआ है। किसान इसका इस्तेमाल अपनी कंबाइन और फसलें ढोने के लिए कर सकते हैं। इस पुल ने कसोवाल एनक्लेव को शेष भारत के साथ हमेशा हमेशा के लिए जोड़ दिया है।


4/23/2020 5:43:00 PM kids programming
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