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आज पंजाब तथा भारत के महान सपूत भाई परमानंद जी की जयंती है

Bhai Parmanand, Koyal, Chhibber

आज पंजाब तथा भारत के महान सपूत भाई परमानंद जी की जयंती है

महान स्वतंत्रता सेनानी भाई परमानंद जी की जयंती पर शत् शत् नमन (4 नवम्बर 1876)

स्वतन्त्रता आन्दोलन के इतिहास में भाई परमानन्द जी का त्याग, बलिदान व योगदान अविस्मरणीय है। भारत माता के इस वीर पुत्र का जन्म पश्चिमी पंजाब के जेहलम जिले के करयाला ग्राम में 4 नवम्बर,1876 को मोहयाल कुल में भाई ताराचन्द्र जी के यहां हुआ था।

लार्ड हार्डिंग बम केस के हुतात्मा भाई बालमुकन्द और भाई परमानन्द जी के परदादा सगे भाई थे। भाई मतिदास भी भाई परमानन्द के पूर्वज थे जिन्हें मुस्लिम क्रूर शासक औरंगजेब ने दिल्ली के चांदनी चौक में आरे से चिरवाया था।

सन् 1891 में भाई परमानंद जी लाहौर आये तथा सन् 1901 में एमए करके चिकित्सक बनने का विचार किया। दयानन्द ऐंग्लो-वैदिक शिक्षण संस्थानों के मुख्य संस्थापक महात्मा हंसराज की प्रेरणा से आपने अपना यह विचार बदल कर दयानन्द कालेज, लाहौर के प्राध्यापक का पद ग्रहण कर लिया।

अंग्रेज सरकार को आपकी गतिविधियों पर शुरू से ही शक था। पुलिस ने एक बार आपके निवास की तलाशी ली। आपके सन्दूक से शहीद भगत सिंह के चाचा अजीत सिंह द्वारा लिखी हुई स्वतन्त्र भारत के संविधान की प्रति तथा बम बनाने के फार्मूले का विवरण बरामद हुआ।

22 फरवरी 1915 को लाहौर षड्यन्त्र केस में भाई परमानंद जी बन्दी बनाये गये थे। 30 सितम्बर, 1915 को विशेष ट्रिब्यूनल ने आपको फांसी का दण्ड सुनाया। आपकी पत्नी भाग सुधि, रघुनाथ सहाय वकील तथा मदनमोहन मालवीय जी के प्रयासों से 15 नवम्बर, 1915 को फांसी का दण्ड पाए 24 में 17 अभियुक्तों की सजा को आजीवन कालापानी में बदल दिया गया।

कालापानी में भाई परमानंद को अनेक यातनाओं से त्रस्त होना पड़ा। आपने यहां जेल में आमरण अनशन किया। लम्बी भूख हड़ताल से आप मृत्यु की सी स्थिति में पहुंच गये। श्री ऐण्ड्रयूज एवं गांधी जी के प्रयासों से आप कालापानी से रिहा किए गये।

सन् 1928 में लाला लाजपतराय जी के बलिदान के बाद पंजाब कांग्रेस के पास उन जैसा कोई नेता नहीं था। कांग्रेस के एक शिष्टमण्डल ने भाई परमानन्द जी से कांग्रेस की बागडोर सम्भालने का अनुरोध किया। भाई जी ने मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति के कारण अपनी असमर्थता व्यक्त की।

मई, 1906 में भाई परमानन्द अफ्रीका में वैदिकधर्म प्रचारार्थ गये। एक दिन अफ्रीका में भ्रमण करते हुए आप हब्शियों की बस्ती में जा पहुंचे। वहां एक चोर को पेड़ से बांध कर जलाया जा रहा था। परमानन्द जी वहां पहुंचे और उसकी जगह स्वयं जलने के लिए तैयार हो गये।

डर्बन में एक सभा जिसमें भाई परमानन्द जी का व्याख्यान हुआ, उसकी अध्यक्षता गांधी जी ने की थी। भाई जी के जोहन्सबर्ग पहुंचने पर गांधी जी उन्हें अपने निवास पर ले गये और श्रद्धावश उनका बिस्तर अपने कंधों पर उठा लिया था।

भाई परमानंद जी ने भारत का इतिहास, यूरोप का इतिहास, महाराष्ट्र का इतिहास, पंजाब का इतिहास, आपबीती एवं वीर बन्दा बैरागी आदि पुस्तकें लिखीं। आपकी सभी पुस्तकों में देश को स्वतन्त्र कराने की प्रेरणा निहित है।

देश विभाजन से भारत माता के लाखों सपूतों के नरसंहार तथा स्त्रियों के सतीत्व-हरण की घटनाओं से आहत भाई परमानंद जी ने इसे राष्ट्रीय अपमान की संज्ञान दी। आपने अन्न त्याग दिया, फिर बोलना भी छोड़ दिया था। 8 दिसम्बर, 1947 को इस महान् देशभक्त ने अपने प्राण त्याग दिये।


11/4/2020 11:44:03 AM kids programming
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