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प्राकृतिक चिकित्सा से औषधि के बिना स्वस्थ एवं सुखी रह सकते है : डॉ. विनीत शर्मा

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प्राकृतिक चिकित्सा से औषधि के बिना स्वस्थ एवं सुखी रह सकते है : डॉ. विनीत शर्मा

मानव शरीर में रोग के आगमन को सर्व साधरण व्यक्त्ति एक स्थिति मानता है और रोग को शत्रु मानकर अनेक प्रकार की गर्म नशीली दवाईयों का प्रयोग करके उसके कष्ट से मुक्त्ति चाहता है। किन्तु प्राकृतिक चिकित्सा की मान्यता है कि कोई भी रोग में विजातीय दृव्य जिस अंग को कमजोर पाता है उधर से निकलना शुरू कर देता है। अगर शरीर में श्लेष्मा की वृद्धि होती है तो नजला जुकाम और खांसी के रूप में प्रकृति उसे बाहर करने का प्रयास करती हैं। यदि आँतो में मल जमा हो तो प्रकृति दस्त के रूप में बाहर निकालती है या निकालने का प्रयास करती है। यदि खून में कोई विकृति है तो त्वचा के रोग दाद, खाज, खुजली के रूप में बाहर निकलने की कोशिश करती हैं। यदि शरीर में अन्य प्रकार के विष इकट्ठे हो जाते हैं तो प्रकृति तेज ज्वर के रूप में उन्हें जलानें का प्रयास करती है। भिन-भिन प्रकार से प्रकृति के द्वारा शरीर से विकार निकालने के भिन-भिन प्रयासों को सर्व-साधारण लोग भिन-भिन रोगों  का नाम दे देता है। परन्तु वास्तव में प्राकृतिक चिकित्सा की दृष्टि से रोग एक है और वह है शरीर के एक्टीत्र विजातीय दृव्य को शरीर से बाहर करने का जो प्रकृति द्वारा किया जाना है तथा जिसे आम लोग 'रोग' कहते हैं।    प्रकृतिक चिकित्सक उस रोग को प्रकृति द्वारा शरीर से विकार निकालने की प्रकिरया मानता है, और वह स्वयं भी कुछ प्रयोगों, जैसे वाष्प स्नान, वमन की किर्या, एनिमा, आहार की शुद्धि, उपवास, आसन, व्यायाम के माध्यम से शरीर से विकार निकालने में सहायता करता है।

मुख्य रूप से शरीर से विकार निकालने के चार रास्ते हैं। आँतो से ठोस रूप में मल, गुर्दे और त्वचा से द्रव रूप में पिशाब और पसीना एवं फेफड़े से वायु रूप में दूषित वायु। ठोस द्रव्य तथा वायु रूप से शरीर से विकार (विजातिय दृव्य) निकालने को यह किर्या दिन रात चलती रहती है। शरीर को निरोग रखने के लिए प्रकृति की यह चेष्टा यदि कुछ श्रणों के लिये बन्द हो जाय तो हम जिन्दा नहीं रह सकते। जब हमारा शरीर अत्यधिक विजातीय दृव्य भार से लद जाता है और प्रकृति की विकार निकालने की चेष्टायें पूरा-पूरा विकार निकालने में अपने को असमर्थ पाती है तभी रोग के एक तीव्र प्रकिर्या प्रारम्भ होती है जो शरीर से विकार निकालने की चेष्टा मात्र है। प्राकृतिक चिकित्सा, मिट्टी, पानी, वायु, सूर्य प्रकाश एवं आकाश तत्व की सहायता से शरीर को विकार से मुक्त्त करने की एक प्रकिर्या है।

इस धरातल के प्राणी मात्र के शरीर में विकार निकालने की प्रकिर्या तथा शरीर निर्माण कार्य अबाध गति से चलता रहता है। स्वास्थ्य के शोध  कर्ता बड़े-बड़े चिकित्सकों का यह अनुभव शत-प्रतिशत सही है। यह शरीर एक स्वचालित मशीन है। इसमें जो कुछ भी बिगाड़ होता है उसकी मरम्मत तथा जो भी क्षय होता है उसको क्षर्तिपूर्ती अपने आप से होती रहती है। एक सिगरेट के निकोटीन जहर से आदमी मर सकता है यदि एक साथ वह आता है कि एक आदमी क्रमशः  1-2 सिगरेट से किन्तु मरता हुआ दिखाई नहीं देता। उसका कारण है कि उसके अन्दर काम करने वाली स्वचालित मशीन उसके शरीर के विष को शवास, गुर्दा और त्वचा के माध्यम से बाहर निकालती रहती है। एक सिगरेट पीने में जितना समय लगता है उसमें सिगरेट का बहुत थोड़ा सा अंश आत्मसात होता है। बाकी बाहर फेंका जाता है। सिगरेट पीते-पीते शरीर क्रमशः उसके विष को सहन करने की क्षमता बढ़ा लेता है और अबाध गति से सिगरेट या किसी नशीली वस्तु को बाहर निकालकर फेंकने का प्रयास करता रहता हैं। शरीर की यह चेष्टा अपने आप में प्राकृतिक चिकित्सा है। इसलिये प्राकृतिक चिकित्सा को कुछ विद्वानों ने स्वयं चिकित्सा (Self Cure) कहा है।

प्रचलित प्राकृतिक चिकित्सा की पद्धति में विभिन प्रकार के एनिमा से आंतों में पुराने जमें हुये मल को निकालने का प्रयत्न किया जाता है। विभिन प्रकार की मालिश से मांसपेशियों, नाड़ी-संस्थान तथा वायु मिले। ऐसी जगह भी बनानी चाहिए जहां हम नंगे बदन कुछ देर तक धूप ले सके। बिना धूप एवं शुद्ध वायु के हम ही क्या पशु तथा पेड़ पौधों का भी  पूर्ण रूप से स्वस्थ रहना संभव नहीं। 

आज के कृत्रिम जीवन में मनुष्य पानी का काम चाय, काफी अथवा बियर से चलाता है पर प्रकृति - पुरूष तो केवल स्वच्छ जल के स्थान पर कोई भी पेय ग्रहण करने में समर्थ नहीं था। अतः नित्य यथेष्ट जल पीने का ध्यान रखना चाहिए।

प्रकृति- पुरूष का जीवन स्वाभाविक होने के कारण बड़ा निशिचन्त था। वह सुख की नींद सोता था पर आज आदमी सदैव चिंतित रहता है। वह पा लिया या पा लूँ , इसे गिराया उसे पछाड़ा के हथोड़े उसके मस्तिष्क पर लगते रहते है और उसका सिर झनझनाता रहता है। अतः हमें निशिचन्त रहने की कला भी सीखनी चाहिए। लेकिन उसका विकास हमें स्वंय करना होगा। उसके विकास में अपने प्रभु को नित्य प्रार्थना सहायक हो सकती है।

यदि उपरोक्त्त बातें संभव हुई तो वह दिन दूर नहीं होगा जब हम आधुनिक जीवन हुए भी औषधि के बिना रहते हुए स्वस्थ एवं सुखी रह सकेंगे।


5/25/2020 9:10:00 AM website company in jalandhar kids programming
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